0522-4300890 | info@myfestival.online

Shravan Mas



श्रावण महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें श्रावण महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था।

पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावण महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें श्रावण महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था।
अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के श्रावण महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया।

क्यों है श्रावण मास सबसे खास

श्रावण के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरुआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।

महादेव का अभिषेक :

महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्च्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

बेलपत्र और समीपत्र :

भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी- तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।

बेलपत्र ने दिलाया वरदान : 

बेलपत्र महादेव को प्रसन्न करने का सुलभ माध्यम है। बेलपत्र के महत्व में एक पौराणिक कथा के अनुसार एक भील डाकू परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटा करता था। श्रावण महीने में एक दिन डाकू जंगल में राहगीरों को लूटने के इरादे से गया। एक पूरा दिन-रात बीत जाने के बाद भी कोई शिकार नहीं मिलने से डाकू काफी परेशान हो गया। इस दौरान डाकू जिस पेड़ पर छुपकर बैठा था, वह बेल का पेड़ था और परेशान डाकू पेड़ से पत्तों को तोड़कर नीचे फेंक रहा था। डाकू के सामने अचानक महादेव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। अचानक हुई शिव कृपा जानने पर डाकू को पता चला कि जहां वह बेलपत्र फेंक रहा था उसके नीचे शिवलिंग स्थापित है। इसके बाद से बेलपत्र का महत्व और बढ़ गया।

हिन्दू धर्म में सावन या श्रावण महीने का खास महत्व है. इस महीने में भगवान शंकर की पूजा की जाती है. ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में सोमवार को व्रत रखने और भगवान शंकर की पूजा करने वाले जातक को मनवांछित जीवनसाथी प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है. विवाहित औरतें यदि श्रावन महीने का सोमवार व्रत रखती हैं तो उन्हें भगवान शंकर सौभाग्य का वरदान देते हैं. 

बहुत से लोग सावन या श्रावण के महीने में आने वाले पहले सोमवार से ही 16 सोमवार व्रत की शुरुआत करते हैं. सावन महीने की एक बात और खास है कि इस महीने में मंगलवार का व्रत भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती के लिए किया जाता है. श्रावण के महीने में किए जाने वाले मंगलवार व्रत को मंगला गौरी व्रत कहा जाता है.

कब से शुरू हो रहा है सावन: 

इस साल श्रावण महीने की शुरुआत 27 जुलाई से हो रही है. लेकिन इसे उदया तिथि यानी 28 जुलाई से मानी जाएगी. 26 अगस्त को श्रावण मास का आखिरी दिन होगा. 26 अगस्त को सोमवार है.
कितने सोमवार: इस साल श्रावण मास में 4 सोमवार पड़ेंगे. अगर आप सावन के महीने में सोमवार व्रत रखते हैं तो इस साल आपको सिर्फ चार ही व्रत रखने होंगे.

महत्वपूर्ण तिथियां: 

28 जुलाई 2018: श्रावण मास शुरू, पहला दिन
30 जुलाई 2018: सावन का पहला सोमवार व्रत
06 अगस्त 2018: सावन सोमवार व्रत
11 अगस्त 2018: हरियाली अमावस्या
13 अगस्त 2018: सावन सोमवार व्रत और हरियाली तीज
20 अगस्त 2018: सावन सोमवार व्रत
26 अगस्त 2018: सावन माह का अंतिम दिन

इस बार सावन में आ रहे हैं ये त्योहार, पहले से कर लें तैयारी

सावन का पवित्र महीना 28 जुलाई से शुरू हो रहा है. शिव भक्तों के लिए यह महीना बेहद महत्व रखता है. इस बार सावन का महीना विशेष योग के साथ आ रहा है. जहां एक ओर यह उदया तिथि में शुरू हो रहा है, वहीं यह गौर करने लायक बात है कि इस बार सावन का महीना 30 दिनों का होगा. आमतौर पर सावन का महीना 28 दिनों या 29 दिनों का होता है. ऐसा संयोग 19 साल बाद बन रहा है जब सावन का महीना 30 दिनों का हो रहा है. 28 जुलाई से शुरू होकर सावन का महीना 26 अगस्त को राखी के त्योहार के साथ खत्म हो जाएगा.
सावन के महीने में इस बार चार सोमवार पड़ेंगे. इसके अलावा इस माह कई अन्य महत्वपूर्ण त्योहार भी पड़ेंगे. जानें इस बार सावन के महीने में कौन-कौन से त्योहार आ रहे हैं.

हरियाली तीज की कथा

इस त्योहार के विषय में मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या की थी उससे प्रसन्न होकर शिव ने हरियाली तीज के दिन ही पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस त्योहार के विषय में मान्यता है कि इससे सुहाग की उम्र लंबी होती है। कुंवारी कन्याओं को इस व्रत से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है।

शिवजी ने पार्वतीजी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के लिए तीज की कथा सुनाई थी। शिवजी कहते हैं-हे पार्वती तुमने हिमालय पर मुझे वर के रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। अन्न-जल त्यागा,पत्ते खाए,सर्दी-गर्मी,बरसात में कष्ट सहे। तुम्हारे पिता दुःखी थे। नारदजी तुम्हारे घर पधारे और कहा- मैं विष्णुजी के भेजने पर आया हूं। वह आपकी कन्या से प्रसन्न होकर विवाह करना चाहते हैं। अपनी राय बताएं।
पर्वतराज प्रसन्नता से तुम्हारा विवाह विष्णुजी से करने को तैयार हो गए। नारदजी ने विष्णुजी को यह शुभ समाचार सुना दिया पर जब तुम्हें पता चला तो बड़ा दुख हुआ। तुम मुझे मन से अपना पति मान चुकी थी। तुमने अपने मन की बात सहेली को बताई। सहेली ने तुम्हें एक ऐसे घने वन में छुपा दिया जहां तुम्हारे पिता नहीं पहुंच सकते थे। वहां तुम तप करने लगी। तुम्हारे लुप्त होने से पिता चिंतित होकर सोचने लगे यदि इस बीच विष्णुजी बारात लेकर आ गए तो क्या होगा।

शिवजी ने आगे पार्वतीजी से कहा- तुम्हारे पिता ने तुम्हारी खोज में धरती-पाताल एक कर दिया पर तुम न मिली। तुम गुफा में रेत से शिवलिंग बनाकर मेरी आराधना में लीन थी। प्रसन्न होकर मैंने मनोकामना पूरी करने का वचन दिया। तुम्हारे पिता खोजते हुए गुफा तक पहुंचे। तुमने बताया कि अधिकांश जीवन शिवजी को पतिरूप में पाने के लिए तप में बिताया है। आज तप सफल रहा, शिवजी ने मेरा वरण कर लिया। मैं आपके साथ एक ही शर्त पर घर चलूंगी यदि आप मेरा विवाह शिवजी से करने को राजी हों।

पर्वतराज मान गए। बाद में विधि-विधान के साथ हमारा विवाह किया। हे पार्वती! तुमने जो कठोर व्रत किया था उसी के फलस्वरूप हमारा विवाह हो सका। इस व्रत को निष्ठा से करने वाली स्त्री को मैं मनवांछित फल देता हूं। उसे तुम जैसा अचल सुहाग का वरदान प्राप्त हो।
महत्व हरे रंग का
इस त्योहार में हरी चूड़ियां, हरा वस्त्र और मेंहदी का विशेष महत्व है। मेंहदी सुहाग का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। इसलिए महिलाएं सुहाग पर्व में मेंहदी जरूर लगाती है। इसकी शीतल तासीर प्रेम और उमंग को संतुलन प्रदान करने का भी काम करती है।
ऐसा माना जाता है कि सावन में काम की भावना बढ़ जाती है। मेंहदी इस भावना को नियंत्रित करता है। हरियाली तीज का नियम है कि क्रोध को मन में नहीं आने दें। मेंहदी का औषधीय गुण इसमें महिलाओं की मदद करता है।
परिवार की खुशहाली
सावन में पड़ने वाली फुहारों से प्रकृति में हरियाली छा जाती है। सुहागन स्त्रियां प्रकृति की इसी हरियाली को अपने ऊपर समेट लेती हैं। इस मौके पर नई-नवेली दुल्हन को सास उपहार भेजकर आशीर्वाद देती है। कुल मिलाकर इस त्योहार का आशय यह है कि सावन की फुहारें की तरह सुहागनें प्रेम की फुहारों से अपने परिवार को खुशहाली प्रदान करेगी और वंश को आगे बढ़ाएगी।

हरियाली तीज पूजा विधि:

हरियाली तीज के दिन विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन स्त्रियों के मायके से श्रृंगार का सामान और मिठाइयां उनके ससुराल भेजी जाती है। हरियाली तीज के दिन महिलाएं सुबह घर के काम और स्नान करने के बाद सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखती हैं। इसके बाद मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा होती है।

पूजा के अंत में तीज की कथा सुनी जाती है। कथा के समापन पर महिलाएं मां गौरी से पति की लंबी उम्र की कामना करती है। इसके बाद घर में उत्सव मनाया जाता है और भजन व लोक नृत्य किए जाते है। इस दिन हरे वस्त्र, हरी चुनरी, हरा लहरिया, हरा श्रृंगार, मेहंदी, झूला-झूलने का भी रिवाज है।

अगस्त 2018 के त्योहार

28 जुलाई शनिवार: सावन महीने का पहला दिन
30 जुलाई, सोमवार: सावन का पहला सोमवार
31 जुलाई, मंगलवार: संकष्टी चतुर्थी
7 अगस्त, मंगलवार: कामिका एकादशी
9 अगस्त, गुरुवार: मासिक शिवरात्रि, प्रदोष व्रत (कृष्ण)
11 अगस्त, शनिवार: आषाढ़ अमावस्या
13 अगस्त, सोमवार: हरियाली तीज, सावन का दूसरा सोमवार
15 अगस्त, बुधवार: नाग पंचमी
17 अगस्त, शुक्रवार: सिंह संक्रांति
21 अगस्त, मंगलवार: श्रावण पुत्रदा एकादशी
23 अगस्त, गुरुवार: प्रदोष व्रत (शुक्ल)
25 अगस्त, शनिवार: ओणम/थिरुवोणम

इस बार सावन में आएंगे 4 सोमवार, पढ़ें सावन के सोमवार की व्रत व पूजन विधि, मंत्र और कथा

 इस महीने की 28 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत हो रही है. श्रावन या सावन मास को भोलेनाथ से जोड़कर देखा जाता है. यहां तक कि इसे भोलेनाथ का महीना ही कहते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस महीने में भोलेनाथ अपने भक्तों की हर इच्छा पूरी करते हैं. खासतौर से सोमवार व्रत करने वाले और उसकी विधिवत पूजन करने वाले जातकों को देवों के देव महादेव कभी निराश नहीं करते. जिनकी शादी नहीं हुई है, उन्हें भगवान शिव अच्छे वर का वरदान देते हैं और जिनकी हो चुकी है, उन्हें सुखमय वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देते हैं.
इस बार सावन में 4 सोमवार आएंगे. पहला सोमवार 30 जुलाई 2018 को है. दूसरा 06 अगस्त को और तीसरा सोमवार 13 अगस्त को है. इसी बीच 11 अगस्त को हरियाली अमावस्या भी है. चौथा और सावन का आखिरी सोमवार 20 अगस्त को है.
26 अगस्त को सावन का आखिरी दिन है. बहुत से लोग सावन या श्रावण के महीने में आने वाले पहले सोमवार से ही 16 सोमवार व्रत की शुरुआत करते हैं. सावन महीने की एक बात और खास है कि इस महीने में मंगलवार का व्रत भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती के लिए किया जाता है. श्रावण के महीने में किए जाने वाले मंगलवार व्रत को मंगला गौरी व्रत कहा जाता है.

सावन के महीने में भक्त तीन प्रकार के व्रत रखते हैं.
  1. सावन सोमवार व्रत
  2. सोलह सोमवार व्रत
  3. प्रदोष व्रत
श्रावण महीने में सोमवार को जो व्रत रखा जाता है, उसे सावन का सोमवार व्रत कहते हैं. वहीं सावन के पहले सोमवार से 16 सोमवार तक व्रत रखने को सोलह सोमवार व्रत कहते हैं और प्रदोष व्रत भगवान शिव और मां पार्वती का आशीर्वाद पाने के प्रदोष के दिन किया जाता है.

व्रत और पूजन विधि

  • सुबह-सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर स्वच्छ कपड़े पहनें.
  • पूजा स्थान की सफाई करें.
  • आसपास कोई मंदिर है तो वहां जाकर भोलेनाथ के शिवलिंग पर जल व दूध अर्पित करें.
  • भोलेनाथ के सामने आंख बंद शांति से बैठें और व्रत का संकल्प लें.
  • दिन में दो बार सुबह और शाम को भगवान शंकर व मां पार्वती की अर्चना जरूर करें.
  • भगवान शंकर के सामने तिल के तेल का दीया प्रज्वलित करें और फल व फूल अर्पित करें.
  • ऊं नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान शंकर को सुपारी, पंच अमृत, नारियल व बेल की पत्तियां चढ़ाएं.
  • सावन सोमवार व्रत कथा का पाठ करें और दूसरों को भी व्रत कथा सुनाएं.
  • पूजा का प्रसाद वितरण करें और शाम को पूजा कर व्रत खोलें.

सावन कथा

पुराने समय की बात है. एक धनवान व्यक्ति के पास सब कुछ था लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी. सारी सुख सुविधा होकर भी संतान ना होने के कारण वह दुखी रहता था. वह भोलेनाथ का भक्त था. वह भोलेनाथ की हर दिन पूजा करता था. उसने सोमवार का व्रत रखना शुरू कर दिया. उसकी सच्ची भक्ति देखकर मां पार्वती और भगवान शंकर ने उसे एक पुत्र का वरदान दिया.
लेकिन बच्चे के जन्म के बाद एक भविष्यवाणी हुई कि 12 साल का होते ही बच्चे की मौत हो जाएगी. भोलेनाथ के भक्त ने अपने पुत्र का अमर रख दिया. बच्चा जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो धनी व्यक्ति ने उसे शिक्षा के लिए मामा जी के साथ काशी भेजने का निर्णय लिया. अमर और मामा जी काशी के लिए निकल पड़े.
अमर और मामा जी जहां, जहां पहुंचे उन्होंने गरीबों का दान दिया. चलते-चलते वे एक नगर में पहुंच गए. नगर की राजकुमारी का विवाह समारोह हो रहा था. दूल्हा एक आंख से काना था. लेकिन यह बात राजकुमारी और उनके परिवार को पता नहीं थी. दूल्हे के माता-पिता ने यह राज छुपा रखा था.
दूल्हे के माता-पिता को यह डर था कि अगर उनका बेटा राजकुमारी के सामने आया तो उनकी पोल खुल जाएगी और शादी टूट जाएगी. इसलिए उन्होंने अमर को कहा कि वह नकली दूल्हा बन जाए. अमर ने आग्रह मान लिया और दूल्हा बन गया. अमर की राजकुमारी से शादी हो गई. अमर राजकुमारी से यह सच्चाई छुपाना नहीं चाहता था, इसलिए उसने राजकुमारी की चुनरी पर सारी सच्चाई लिख दी. राजकुमारी वह खत पढ़कर हैरान रह गई. अब वह उस काने राजकुमार के साथ जाने को तैयार नहीं थी. राजकुमारी ने अमर से कहा कि वह उन्हीं की पत्नी है और शिक्षा पूर्ण कर वापस आने तक वह यहीं इंतजार करेगी.
मामा जी और अमर काशी चले गए. समय आगे बढ़ता रहा. अमर 12 साल का हो गया था और शिवलिंग पर बेल पत्तियां चढ़ा रहा था. तभी यमराज उसके सामने आकर खड़े हो गए. लेकिन इससे पहले ही भगवान शंकर अमर की भक्ति और नेक कार्यों से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु का वरदान दे चुके थे. यमराज को खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ा. काशी में अपनी शिक्षा प्राप्त करने के बाद अमर अपनी पत्नी को लेकर घर लौट गया और सपरिवार खुशी-खुशी रहने लगा.

Related Post