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New Year



नए वर्ष का उत्सव पूरी दुनिया में मनाया जाता है । नया वर्ष लोगों के लिए नई उम्मीदें लेकर आता है । पूरा वर्ष कैसे बीता, इसका आकलन किया जाता है तथा उस वर्ष में रही कमियों को अगले वर्ष पूरा करने का संकल्प लिया जाता है । 31 दिसंबर की संध्या को विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है । सार्वजनिक स्थानों पर गीत-संगीत के कार्यक्रम होते हैं । रेडियो और टेलीविजन पर विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण होता है । मध्य रात्रि को आकर्षक आतिशबाजी का प्रदर्शन किया जाता है । लोग एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं ।

नववर्ष उत्सव

नए वर्ष का उत्सव पूरी दुनिया में मनाया जाता है । भारत में पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते चलन के कारण नव वर्ष का दिन 1 जनवरी, भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण उत्सव का दिन माना जाता है। नया वर्ष लोगों के लिए नई उम्मीदें लेकर आता है । इस दिन बीते पूरे वर्ष की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को याद किया जाता है । पूरा वर्ष कैसे बीता, इसका आकलन किया जाता है तथा उस वर्ष में रही कमियों को अगले वर्ष पूरा करने का संकल्प लिया जाता है । 31 दिसंबर की संध्या को विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है । सार्वजनिक स्थानों पर गीत-संगीत के कार्यक्रम होते हैं । रेडियो और टेलीविजन पर विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण होता है । मध्य रात्रि को आकर्षक आतिशबाजी का प्रदर्शन किया जाता है । लोग एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं । प्रियजनों को पुष्प गुच्छ एवं उपहार दिया जाता है । 1 जनवरी को कुछ लोग पिकनिक एवं दर्शनीय स्थानों के भ्रमण पर निकलते हैं । इस तरह नववर्ष का उत्सव हमारे अंदर नई आशाएँ जागृत करता है।

लोग इस दिन गाना गाते हैं, नाचते हैं, तरह-तरह के खेल खेलते हैं, पार्टियों में जाते हैं, फ़िल्में देखने जाते हैं। शहरों की बात तो छोड़ें गाँव में भी लोग पिकनिक मनाने जाते हैं। 31 दिसम्बर की रात के 12 बजे, नए साल से एक दिन पहले लोग जश्न मनाते हैं खूब सारे पटाखे भी फोड़ते हैं। नए साल के प्रथम दिन लोग एक दुसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएं देते हैं और कुछ लोग ग्रीटिंग कार्ट देते हैं, गिफ्ट देते हैं और साथ मिल कर पार्क में घूमने भी जाते हैं। इस दिन टेलीविज़न पर मीडिया चैनल वाले भी लोगों के द्वारा आयोजित तरह-तरह के प्रोग्रामों को टीवी पर टेलीकास्ट करते हैं। इस दिन हर कोई व्यक्ति जीवन में एक नई और अच्छी शुरुवात करने की सोचते हैं। 

बड़े-बड़े शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर और चेन्नई में बड़े लाइव कॉन्सर्ट किये जाते हैं जिनमें बॉलीवुड के सितारे और मशहूर लोग एकत्र होते हैं और कार्यक्रम में भाग लेते हैं। हजारों की तागाद में लोग उनके इन समारोह को देखने के लिए आते हैं। कुछ लोग अपने परिवार, मित्रों के साथ घर में मिलकर पार्टी मनाते हैं तो कुछ लोग बाहर घूमने जाते हैं। यह सब समारोह बस इसलिए होते हैं ताकि हम बीते हुए साल को हँसते-हँसते विदा कर सकें और हँसते-हँसते ढेर सारी खुशियों, उमंगो और नयी आशाओं के साथ नए वर्ष का स्वागत कर सकें।

हिन्दू नव वर्ष के कुछ तथ्य

वीर विक्रमादित्य ने शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी। इसी सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर भारत में विक्रमी संवत प्रचलित हुआ। सम्राट पृथ्वीराज के शासनकाल तक इसी संवत के अनुसार कार्य चला। इसके बाद भारत में मुगलों के शासनकाल के दौरान सरकारी क्षेत्र में हिजरी सन चलता रहा। इसे भाग्य की विडंबना कहें अथवा स्वतंत्र भारत के कुछ नेताओं की अकृतज्ञता कि सरकार ने शक संवत को स्वीकार कर लिया, लेकिन सम्राट विक्रमादित्य के नाम से प्रचलित संवत को कहीं स्थान न दिया।

31 दिसंबर की आधी रात को नव वर्ष के नाम पर नाचने वाले आम जन को देखकर तो कुछ तर्क किया जा सकता है, पर भारत सरकार को क्या कहा जाए जिसका दूरदर्शन भी उसी रंग में रंगा श्लील-अश्लील कार्यक्रम प्रस्तुत करने की होड़ में लगा रहता है और स्वयं राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री पूरे राष्ट्र को नव वर्ष की बधाई देते हैं। भारतीय सांस्कृतिक जीवन का विक्रमी संवत से गहरा नाता है। इस दिन लोग पूजापाठ करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाते हैं। लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं।

मांस-मदिरा का सेवन करने वाले लोग इस दिन इन तामसी पदार्था से दूर रहते हैं, पर विदेशी संस्कृति के प्रतीक और गुलामी की देन विदेशी नव वर्ष के आगमन से घंटों पूर्व ही मांस मदिरा का प्रयोग, श्लील-अश्लील कार्यक्रमों का रसपान तथा अन्य बहुत कुछ ऐसा प्रारंभ हो जाता है जिससे अपने देश की संस्कृति का रिश्ता नहीं है। विक्रमी संवत के स्मरण मात्र से ही विक्रमादित्य और उनके विजय अभियान की याद ताजा होती है, भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है जबकि ईसवी सन के साथ ही गुलामी द्वारा दिए गए अनेक जख्म हरे होने लगते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नव वर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नव वर्ष से कोई संबंध नहीं। यही हम लोगों को भी समझना होगा।

हमारे देश से गोरे अंग्रेज तो चले गए मगर काले अंग्रेजों को छोड़ गए। ये काले अंग्रेज विदेशी परंपराओं और फूहड़ नाच गानों के ऐसे दीवाने हैं कि अपने देश की गरिमामयी सांस्कृतिक परंपराओं, मूल्यों और आचरण का इनके लिए कोई मूल्य नहीं है। संस्कृति के इस प्रदूषण के करेले में नीम का काम किया है सैटेलाईट चैनलों ने। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रायोजित विदेशी उत्सवों को इन खबरिया चैनलों पर खूब प्रचार मिलता हैं मगर हमारे अपने ही देश की परंपराओं और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों को लेकर इऩ चैनलों द्वारा हमेशा उदासीनता बरती जाती है। नव वर्ष भारत में ग्रेगोरी कैलेण्डर के अनुसार 1 जनवरी को माना जाता है। यह दिन विश्व में हर किसी व्यक्ति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण अवसर से भरा होता है। भारत के साथ-साथ विश्व के सभी देश नए साल के शुरुवात पर जश्न मनाते हैं और अपने प्रियजनों के साथ मिल कर इस दिन का मज़ा उठाते हैं।

नववर्ष एक सन्देश

अलग अलग देशों में विभिन्न प्रकार के उत्सव एवं त्योहार मनाये जाते हैं । त्योहारों का अपना विशेष महत्त्व होता है । त्योहार जहाँ एक ओर हमें खुशी प्रदान करते हैं वहीं दूसरी ओर हम में सामाजिक रूप से एकता का भाव जाग्रत करते हैं । भारत और विश्व में अनेक प्रकार के त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं। लेकिन कोई ऐसा त्योहार या उत्सव नहीं है जिसे समस्त भारत अथवा विश्व एक साथ मिलकर मनाये। अधिकांश त्योहार क्षेत्रीय अथवा धार्मिक रूप लिये हुए हैं। जिसके कारण समस्त जन भाग नहीं ले पाते। लोग स्वभाव से उत्सव प्रिय होते हैं इसलिये अब वे एक दुसरे के त्योहारों में शामिल होने लगे हैं। जैसे क्रिसमस डे ,दिवाली इत्यादि।

 ऐसे में नव वर्ष भी एक तरह से त्योहार के रूप में उभर कर आ रहा है, जो समस्त विश्व में एक साथ मनाया जाता है । हालांकि विभिन्न देशों और धर्मों में नव वर्ष अलग अलग तिथि को मनाया जाता है।

किंतु अंग्रेजी कैलेन्डर के अनुसार एक जनवरी से नया साल की शुरुआत मानी जाती है। इसलिए पूरी दुनिया में नव वर्ष एक जनवरी को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसका क्षेत्र अथवा सम्प्रदाय से कोई सम्बंध नहीं है । यह सबका उत्सव है । सब धर्म के लोग समान रूप से इसमें भाग लेते है और भेदभावरहित एक दुसरे को शुभकामनायें देते हैं। यह समानता का प्रतीक बनता जा रहा है, जो कि समाज के लिये बहुत ही अच्छी बात है । इसलिये आज नव वर्ष का महत्व बढ़ता जा रहा है ।

लोगों ने अवधारणा बना ली है कि यदि साल के पहले दिन को उत्साह और खुशी के साथ मनाया जायेगा तो पूरा वर्ष खुशी से बीतेगा । इसलिए दिवाली जैसे त्योहारों की भांति इस दिन भी लोग नये-नये कपड़े पहनना मिठाईयाँ खाना नये-नये पकवान बनाना , पटाखे फोड़ना आदि कार्य करते हैं । जीवन के नये लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं । संकल्प लिये जाते हैं ।

इस तरह नववर्ष एक सन्देश देता है जो भी हुआ सब बुराइयों को भुला कर अपने जीवन में आगे बढ़े और खुशियाँ बांटे क्योकिं नया वर्ष अपने दोनों हाथों से हमें खुशियाँ बांटने आया है। अतः हमें उसका स्वागत करना चाहिये।

देश देश में नव वर्ष

अंग्रेज़ी नव वर्ष के सबसे क़रीब हम लोग जो त्योहार मनाते हैं वह लोहड़ी, भोगली बिहू, पोंगल, गुड़ी पड़वा या मकर संक्रांति मान सकते हैं। लेकिन विश्व में कई जगह 'पश्चिम को छोड़ कर' नया साल एक बड़ा त्योहार होता है। 

चीन में एक महीने पहले से ही घरों की सफ़ाई और रंग-रोगन चालू हो जाता है। इस त्योहार में लाल रंग महत्वपूर्ण होता है और खिड़की दरवाज़े अक्सर इसी रंग से रंगे जाते हैं। लाल पहनना शुभ, और काला या सफ़ेद अशुभ समझा जाता है। अगले दिन बच्चों और अविवाहितों को खुशियों के प्रतीक के रूप में रकम से भरा लाल लिफ़ाफ़ा दिया जाता है। चीनी लोगों का ऐसा मानना है कि हर रसोई में एक देवता रहता है जो उस परिवार का सारे साल का लेखा-जोखा वर्ष के अंत में ईश्वर के पास पहुँचाता है और वापस उसी परिवार में लौट आता है। सो इस हफ़्ते में उसे विदा करने और फिर से उसका स्वागत करने के लिए पूरे सप्ताह आतिशबाजी चलती है और स्वागत समारोह आयोजित किए जाते हैं। तेज़ आतिशबाजी के पीछे मक़सद बुरी आत्माओं को भगाना भी माना जाता है। यहाँ ड्रेगन दीर्घ आयु और सुख समृद्धि का प्रतीक है।

जापानी नव वर्ष पहले २० जनवरी से १९ फरवरी के बीच हुआ करता था। पर अब यह २९ दिसम्बर की रात से ३ जनवरी तक ३ दिन तक मनाया जाता है। इस पर्व को यहाँ याबुरी नाम से जाना जाता है। हमारी दीवाली की तरह घर की सफ़ाई इस त्योहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। घर ही नहीं अपितु बौद्ध और शितो मंदिरों की भी बड़े आयोजन के साथ दिसंबर में ही सफ़ाई और सजावट आरंभ हो जाती है। सजावट में पाइन बांस और प्लम पेड़ों के विभिन्न हिस्सों का उपयोग किया जाता है और घर के बाहर रोशनी की जाती है। जापानियों का मानना है कि साफ़ घर में सुख और समृद्धि आती है। 

म्यांमार में, जो भारत का पड़ोसी देश है, नव वर्ष के उत्सव को 'तिजान' कहते हैं जो तीन दिन चलता है। यह पर्व अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है। भारत में होली की तरह इस दिन एक दूसरे को पानी से भिगो देने की परंपरा इस पर्व का प्रमुख अंग है। अंतर इतना है कि इस पानी में रंग की जगह इत्र पड़ा होता है। प्लास्टिक की पिचकारियों में पानी भर कर लोग बिना छत की गाड़ियों में सवार एक दूसरे पर खुशबूदार पानी की बौछारें करते चलते हैं। त्योहार की तैयारी एक हफ़्ते पहले से शुरू हो जाती है। घरों की सफ़ाई और सजावट तो होती ही है, सड़कों पर शामयाने लगाकर खुशी मनाई जाती है। मित्रों व परिचितों को बुलाया जाता हे और मिठाइयाँ खिलाकर नव वर्ष के पर्व का मज़ा उठाया जाता है। विभिन्न प्रकार के नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है और यह कार्यक्रम हफ़्ते भर तक चलते ही रहते हैं। भगवान बुद्ध की पूजा का इस पर्व का विशेष अंग है।

ईरान मे नव वर्ष के समारोह को 'नौरोज' कहते हैं। सूर्य के मेष राषि में प्रवेश करने के दिन यह पर्व मनाया जाता है। यह अकेला ऐसा मुस्लिम पर्व है जिसका मुहम्मद साहब से कोई संबंध नहीं है। लोग भोजन, मिठाइयों और उपहारों की तश्तरियाँ एक दूसरे के घर भेजते हैं। साल के अंतिम सप्ताह में बाज़ार सजावट और रोशनी से जगमगा उठते हैं। नये साल का उत्सव बारह दिनों तक चलता है। नवरोज़ में मेज़ की सजावट का विशेष महत्व होता है और इसको हफ़्तसिन कहते हैं। त्योहार से पंद्रह दिन पहले गेहूँ के दाने बो दिए जाते हैं। नौरोज़ के दिन मेज़ के चारों ओर बैठकर इन अंकुरों को पानी से भरे बर्तन में परिवार के सभी लोग बारी-बारी से डालते हैं। मेज़ पर शीशा, एक झंडा, एक मोमबत्ती तथा एक रोटी रखी जाती है जो ईरानी लोग शुभ मानते हैं। 

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