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Ekadashi



हिंदू पंचांग की ग्यारहवी तिथि को एकादशी कहते हैं। यह तिथि मास में दो बार आती है। पूर्णिमा के बाद और अमावस्या के बाद। एकादशी व्रत बहुत ही सख्त होता है, यह करीब 48 घंटे का व्रत होता है।

एकादशी तिथि

हिंदू पंचांग की ग्यारहवी तिथि को एकादशी कहते हैं। यह तिथि मास में दो बार आती है। पूर्णिमा के बाद और अमावस्या के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। इन दोने प्रकार की एकादशियों का भारतीय सनातन संप्रदाय में बहुत महत्त्व है। एकादशी व्रत बहुत ही सख्त होता है। यह एकादशी तिथि से पहले सूर्यास्त से लेकर एकादशी से अगले सूर्योदय तक रखा जाता है यह करीब 48 घंटे का व्रत होता है।

साल 2018 के लिए एकादशी व्रत की सूची

12 जनवरी (शुक्रवार) षटतिला एकादशी(कृ) 
28 जनवरी (रविवार) पौशा पुत्रदा एकादशी(शु) 
11 फरवरी (रविवार) विजया एकादशी(कृ) 
26 फरवरी (सोमवार) जाया एकादशी(शु) 
13 मार्च (मंगलवार) पापमोचनी एकादशी(कृ) 
27 मार्च (मंगलवार) आमलकी एकादशी(शु) 
12 अप्रैल (गुरुवार) वरुथिनी एकादशी(कृ) 
26 अप्रैल (गुरुवार) कामदा एकादशी(शु) 
11 मई (शुक्रवार) अपरा एकादशी(कृ) 
25 मई (शुक्रवार) मोहिनी एकादशी(शु) 
10 जून (रविवार) अपरा एकादशी(कृ) 
23 जून (शनिवार) निर्जला एकादशी(शु) 
09 जुलाई (सोमवार) योगिनी एकादशी(कृ) 
23 जुलाई (सोमवार) निर्जला एकादशी(शु) 
07 अगस्त (मंगलवार) वैष्णव कामिका एकादशी(कृ) 
21 अगस्त (मंगलवार) देवशयनी एकादशी(शु) 
22 अगस्त (बुधवार) देवशयनी एकादशी(शु) 
06 सितम्बर (गुरुवार) अजा एकादशी(कृ) 
20 सितम्बर (गुरुवार) श्रवण पुत्रदा एकादशी(शु) 
05 अक्तूबर (शुक्रवार) इंदिरा एकादशी(कृ) 
20 अक्तूबर (शनिवार) परस्व एकादशी(शु) 
03 नवम्बर (शनिवार) रमा एकादशी(कृ) 
19 नवम्बर (सोमवार) पापांकुशा एकादशी(शु) 
03 दिसम्बर (सोमवार) उत्पन्न एकादशी(कृ) 
19 दिसम्बर (बुधवार) देवउत्थाना एकादशी(शु)

व्रत

एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना पड़ेगा। इस दिन मांस, प्याज, मसूर की दाल आदि का निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा भोग-विलास से दूर रहना चाहिए।

एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उँगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें। प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि 'आज मैं चोर, पाखंडी और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूँगा और न ही किसी का दिल दुखाऊँगा। रात्रि को जागरण कर कीर्तन करूँगा।

'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादश मंत्र का जाप करें। राम, कृष्ण, नारायण आदि विष्णु के सहस्रनाम को कंठ का भूषण बनाएँ। भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करें कि- हे त्रिलोकीनाथ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करना।

यदि भूलवश किसी निंदक से बात कर भी ली तो भगवान सूर्यनारायण के दर्शन कर धूप-दीप से श्री‍हरि की पूजा कर क्षमा माँग लेना चाहिए। एकादशी के दिन घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है। इस दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए। न नही अधिक बोलना चाहिए। अधिक बोलने से मुख से न बोलने वाले शब्द भी निकल जाते हैं।

इस दिन यथा‍शक्ति दान करना चाहिए। किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि कदापि ग्रहण न करें। दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है। वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए। त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें।

फलाहारी को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, कुलफा का साग इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणा देना चाहिए। क्रोध नहीं करते हुए मधुर वचन बोलना चाहिए।

देवशयनी एकादशी 

आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी को हिंदू धर्म में मनोकामना पूर्ति के रूप में भी मनाया जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु चार महीने के लिए पाताल लोग में चले जाते हैं और राजा बलि के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं।

देवशयनी एकादशी के समय सारे शुभ कार्यो में विराम लग जाता है। देवशयनी एकादशी को आषाढ़ी एकादशी, पदमा एकादशी और हरी शयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं इस दिन कैसे पूजा करने से भगवान विष्णु होते हैं प्रसन्न् और पूरी करते हैं भक्तों की सभी इच्छा। 

निर्जला एकदशी का महत्‍व 

हिन्‍दू पंचांग के अनुसार एक साल में कुल 24 एकादशियां पड़ती हैं. सभी एकादशियों में व्रत करने के साथ ही भगवान विष्‍णु की पूजा-अर्चना की जाती है. इनमें निर्जला एकादशी का सबसे ज्‍यादा महत्‍व है. मान्‍यता है कि इस एकादशी का व्रत अत्‍यंत लाभकारी है. माना जाता है कि जो लोग सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते हैं उन्‍हें निर्जला एकादशी का व्रत रखना चाहिए. मान्‍यता है कि साल भर की 24 एकादशियों के व्रत का फल केवल एक निर्जला एकादशी का व्रत रखने से मिल जाता है. आपको बता दें कि मलमास या अधिमास होने के कारण इस साल 24 के बजाए कुल 26 एकादशियां हैं.

निर्जला एकादशी की पूजा विधि 

निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्‍णु का पूजन किया जाता है. इस दिन पवित्र नदियों में स्‍नान का विशेष महत्‍व है. अगर नदी में जाकर स्‍नान न भी कर पाएं तो सुबह-सवेरे घर पर ही स्‍नान करने के बाद 'ऊँ नमो वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना चाहिए. 24 घंटे तक अन्‍न और जल के बिना रहकर अगले दिन स्‍नान करने के बाद विष्‍णु जी की पूजा करें. फिर ब्राहम्ण को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें.

निर्जला एकादशी व्रत कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार पांडवों के दूसरे भाई भीमसेन खाने-पीने के बड़े शौकीन थे. वह अपनी भूख पर नियंत्रण नहीं रख पाते थे. उन्‍हें छोड़कर सभी पांडव और द्रौपदी एकादशी का व्रत किया करते थे. इस बात से भीम बहुत दुखी थे कि वे ही भूख की वजह से व्रत नहीं रख पाते हैं. उन्‍हें लगता था कि ऐसा करके वह भगवान विष्‍णु का निरादर कर रहे हैं.

अपनी इस समस्‍या को लेकर भीम महर्षि व्‍यास के पास गए. तब महर्षि ने भीम से कहा कि वे साल में एक बार निर्जला एकादशी का व्रत रखें. उनका कहना था कि एकमात्र निर्जला एकादशी का व्रत साल की 24 एकादश‍ियों के बराबर है. तभी से इस एकादशी को भीम एकादशी के नाम से जाना जाने लगा.

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