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Vishvkerma



कभी सोचा है कि ये पृथ्वी, पहाड़, नदी, पेड़ किसने बनाए? किसने सोचा होगा कि महासागर में खारा पानी होगा और धरती पर ऑक्सीजन होगी ताकि जीव-जंतु पनप सके? इन सब के रचयिता हैं भगवान विश्वकर्मा। 

विश्वकर्मा पूजा

विश्वकर्मा भवन निर्माण कला (शिल्प शास्त्र) के ही देवता है। विश्वकर्मा पूजा सभी मजदूर, मिस्त्री, इंजीनियर करते हैं। पूरे देश में इसे शवम दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व को सभी सरकारी और प्राइवेट इंजिनियरिंग सस्थानो में बड़े उल्लास से मनाया जाता है। बड़ी बड़ी बिल्डिंगों के जिन एसी कमरों के बीच हम बैठ कर काम करते हैं, उनके बारे में हम कितना जानते हैं? बस यही कि इन्हें इंजीनियरों और मजदूरों ने बनाया है, लेकिन कभी सोचा है कि पत्थर को सीमेंट में रखना है या मिट्टी खोद कर ही घर की नींव होनी चाहिये, लकड़ी काटने के लिये दांतेदार आरी चाहिये, ये किसने सोचा होगा। ये पृथ्वी, पहाड़, नदी, पेड़ किसने बनाए? किसने सोचा होगा कि महासागर में खारा पानी होगा और धरती पर ऑक्सीजन होगी ताकि जीव-जंतु पनप सके? इन सब के रचयिता हैं भगवान विश्वकर्मा। 

भगवान विश्वकर्मा को हिंदू धर्म में सृजन और निर्माण (शिल्प शास्त्र) का देवता माना जाता है। इनको “देवताओं का शिल्पकार” माना जाता है। हर साल विश्वकर्मा पूजा और विश्वकर्मा जयंती कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। इसे पूरे देश को बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। सभी लोग विश्वकर्मा देवता की पूजा करते है, अपने औजारों की साफ सफाई करते है, उनकी पूजा करते है और प्रसाद बड़े उल्लास से बांटते हैं।
 
दुकानों को रंग बिरंगे कागज से सजाते है, गुब्बारे लगाते है। औजारों की विशेष रूप से पूजा करते है क्यूंकि बिना इनके हम कोई भी चीज नही बना सकते है। कुर्सी, मेज से लेकर बड़े हवाई जहाज, ट्रेन, लड़ाकू विमान, युद्धपोत बनाने के लिए हमे औजारों की जरूरत होती है। ऐसी मान्यता है की भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से शिल्प कला का विकास होता है, और ज्ञान मिलता है जिससे इंजीनियर, मिस्त्री, वेल्डर, बढ़ई, मकेनिक, जैसे पेशेवर लोग और अधिक कुशलता से काम कर पाते है। यदि हमारे जीवन से शिल्प कला (भवन और वस्तु निर्माण कला) को निकाल दिया जाये तो हम फिर से पाषाण काल में चले जायेंगे। आज जितना भी विकास हम अपने चारो तरफ देखते है उसे बिना शिल्प कला के बना पाना असम्भव होता। 

कहाँ होती है विश्वकर्मा पूजा

इस दिन पूरे देश में विश्वकर्मा पूजा सभी फैक्ट्रियों, कारखानों, लोहे की दुकानों, मोटर गाड़ी की दुकानों, वर्कशाप, सर्विस सेंटर मे की जाती है। सभी औजारों की अच्छे से सफाई की जाती है। उनको रंगा जाता है। इस दिन फैक्ट्रियों, वर्कशाप बंद रहता है। कोई काम नही होता है। सिर्फ विश्वकर्मा पूजा ही की जाती है।

विश्वकर्मा पूजा शुभ मुहूर्त 2018 
विश्वकर्मा पूजा 2018 में 17 सितंबर, सोमवार के दिन मनाया जायेगा।
संक्रांति समय 7. 01 सुबह

कौन लोग मनाते है विश्वकर्मा पूजा

  • बुनकर
  • कारीगर जो लोहे और अन्य धातुओं से वस्तु निर्माण करते है
  • इंजीनियर
  • राजमिस्त्री
  • मजदूर
  • शिल्पकार
  • बढ़ई
  • वेल्डर
  • मकेनिक
  • सभी औद्योगिक घराने

कौन थे भगवान विश्वकर्मा

आदिकाल में सिर्फ 3 प्रमुख देवता थे- ब्रम्हा, विष्णु, महेश। ब्रम्हा जी के पुत्र का नाम “धर्म” था जिनका विवाह “वस्तु” नामक कन्या से हुआ था। उसके बाद धर्म को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम “विश्वकर्मा” रखा गया।

विश्वकर्मा पूजा करने की विधि :-
  • सुबह जल्दी उठ कर स्नान करें
  • पूजा स्थल पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा रखें
  • अपने औजार भी पूजा स्थान पर रखें
  • कलश जल भी पूजा स्थान पर रखें
  • विश्वकर्मा प्रतिमा पर पुष्प चढ़ा कर धूप और दीप जलाएं
  • औजारों को धूप लगाएं और तिलक लगाएं
  • प्रसाद का भोग लगाएं
  • हाथ में पुष्प और अक्षत लेकर विश्वकर्मा का ध्यान करें
  • हवन के बाद प्रसाद बांटें 
विश्वकर्मा पूजा मंत्र
विश्वकर्मा पूजा के समय इस मंत्र का जाप करना चाहिए:
ओम आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम:
ओम अनन्तम नम:, पृथिव्यै नम:

विश्वकर्मा पूजा फल

भगवान विश्वकर्मा की पूजा जो भी सच्चे दिन से करता है, उनका बेड़ा पार हो जाता है। कारोबार में कभी घाटा नहीं होता बल्कि रोज के रोज व्यापार बढ़ता जाता है। नौकरी में मान सम्मान मिलता है। घर में धन सम्पदा कि कोई कमी नहीं रहती। सारा जीवन सुखी हो जाता है। ये पूजा करने से व्यापार में तरक्की होती है। एक दूकान से दो दूकान हो जाती है, एक कारखाना से 2, 3 कारखाने हो जाते हैं। व्यापार बढ़ता है। पूजा करने से धोखा नही देती मशीन, बार बार खराब नही होती है मशीन ।

भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाये गये प्रमुख भवन और वस्तुयें-

  1. भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका का निर्माण किया
  2. रावण की नगरी लंका का निर्माण किया
  3. स्वर्ग में इंद्र के सिंघासन को बनाया
  4. पांड्वो की नगरी इन्द्रप्रस्थ को बनाया
  5. इंद्र का वज्र भी इन्होने दधीची की हड्डियों से बनाया था
  6. महाभारत काल में हस्तिनापुर का निर्माण किया
  7. जगन्नाथ पूरी में “जगन्नाथ” मंदिर का निर्माण किया
  8. पुष्पक विमान का निर्माण किया
  9. सभी देवताओं के महलो का निर्माण किया
  10. कर्ण का कुंडल बनाया
  11. विष्णु का सुदर्शन चक्र बनाया
  12. भगवान शंकर का त्रिशूल का निर्माण किया
  13. यमराज का कालदंड बनाया

भगवान विश्वकर्मा कथा

कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा के पुत्र  “धर्म” का विवाह “वस्तु” से हुआ। इन दोनों के 7 पुत्र जन्मे। 7वां जो पुत्र था उनका नाम “वास्तु” रखा गया। वास्तु का आगे विवाह हुआ और विवाह उपरांत एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम रखा गया “विश्वकर्मा”। जिन्होंने आगे चल कर पूरे संसार को आकृति दी।     

किस्सा

सूतजी बोले,प्राचीण समय की बात है,मुनि विश्वमित्र के बुलावे पर मुनि और सन्यासी लोग एक स्थान पर एकत्र हुए सभा करने के लिये। सभा मे,मुनि विश्वमित्र ने सभी को संबोधित किया। मुनि विश्वमित्र ने कहा कि,हे मुनियों आश्रमों में दुष्ट राक्षस यज्ञ करने वाले हमारे लोगों को अपना भोजन बना लेते,यज्ञों को नष्ट कर देतें है। जिसके कारण् हमारें पुजा-पाठ,ध्यान आदि में परेशानी हो रही है। इसलिए अब हमे तत्काल् उनके कुकृत्यों से बचने का कोई उपाय अवश्य करना चाहिए। मुनि विश्वमित्र की बातों को सुनकर वशिष्ठ मुनि कहने लगे कि एक बार पहले भी ऋषि-मुनियों पर इस प्रकार का संकट आया था । उस समय् हम् सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गये थें। ब्रह्माजी ने ऋषि मुनियों को संकट से छुटकारा पाने के लिए उपाय बताया था।। ऋषि लोंगों ने ध्यानपूर्वक वशिष्ठ मुनि कि बातों को सुना और कहने लगे कि वशिष्ठ मुनि ने ठीक ही कहा है, हमें ब्रह्मदेव् के ही शरण में जाना जाना चाहिये।

ऐसा सुन सब ऋषि-मुनियों ने स्वर्ग को प्रस्थान किया। मुनियों के इस प्रकार कष्ट को सुनकर ब्रह्मा जी को बडां आश्चर्य हुआ,ब्रह्मा जी कहने लगे कि,हे मुनियों राक्षसों से तो स्वर्ग मे रहनें वाले देवता को भी भय लगता रहता है। फिर मनुष्यों का तो कहना ही क्या जो बुढापे और मृत्यु के दुखों में लिप्त रहतें हैं। उन राक्षसों को नष्ट करने में श्री विश्वकर्मा समर्थ है,आप लोग् श्री विश्वकर्मा के शरण में जाएँ। इस समय पृथ्वी पर अग्नि देवता के पुत्र मुनि अगिरा यज्ञों में श्रेष्ठ पुरोहित हैं, और जो श्री विश्वकर्मा के भक्त है। वही आपके दुखों को दुर कर सकते हैँ,इसलिए हे मुनियों,आप उन्ही के पास जायें। सूतजी बोलें,ब्रह्मा जी के कथन के अनुसार मुनि लोग अगिंरा ऋषि पास गयें। मुनियों की बातों को सुनकर अगिंरा ऋषि ने कहा, हे मुनियों आप लोग क्यों व्यर्थ् मे इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहें है। दुखों को दुखों दुर करने मे विश्वकर्मा भगवान के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नही है।

अमावस्या के दिन,आप लोग अपने साधारण कर्मों को रोक कर भक्ति पूर्वक “श्रीविश्वकर्मा कथा” सुनों उनकी उपासना करो। आपके सारे कष्टों को विश्वकर्मा भगवान अवश्य दुर करेंगे। महर्षि अगिंरा के बातों को सुनकर सभी लोग अपने-अपने आश्रमों को चले गये। तत्प्रश्चात् अमावस्या के दिन,मुनियों नें यज्ञ किया। यज्ञ में विश्वकर्मा भगवान का पूजन किया। “श्री विश्वकर्मा कथा” को सुना। जिसका परिणाम यह हुआ कि सारे राक्षस भस्म हो गए। यज्ञ विघ्नों से रहित हो गया,उनकें सारे कष्ट दुर हो गयें। जो मनुष्य भक्ति-भाव् से विश्वकर्मा भगवान की पूजा करता है,वह सुखों को प्राप्त करता हुआ संसार में बङे पद को प्राप्त करता है।

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