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Losar



लोसर तिब्बत, नेपाल और भुटान का सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध पर्व (त्यौहार) है। यह त्योहार बौद्धों के लिए नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, भारत के आसम और सिक्किम राज्यों में ये त्यौहार मनाया जाता है। लोसार भारत के विभिन्न हिस्सों में तिब्बती बौद्धों द्वारा मनाए जाने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है। बौद्ध अच्छी तरह से तैयार होते हैं, अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं और विभिन्न देवताओं के आशीर्वाद मांगने के लिए मंदिरों में पूजा करते हैं। 10 दिवसीय यह उत्सव धार्मिक और आवासीय स्थानों में रोशनी के साथ शुरू होता है।

लोसर 

लोसर तिब्बती भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है - 'नया वर्ष' ('लो' = नया, 'सर' = वर्ष ; युग)। लोसर, तिब्बत, नेपाल और भुटान का सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध पर्व (त्यौहार) है। भारत के आसम और सिक्किम राज्यों में ये त्यौहार मनाया जाता है। लोसार भारत के विभिन्न हिस्सों में तिब्बती बौद्धों द्वारा मनाए जाने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है। बौद्ध अच्छी तरह से तैयार होते हैं, अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं और विभिन्न देवताओं के आशीर्वाद मांगने के लिए मंदिरों में पूजा करते हैं।

सबसे बड़े तिब्बती बौद्ध महोत्सव लोसर का 12 दिसंबर 2015 को जम्मू एवं कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में शुभारम्भ  हुआ. यह त्योहार बौद्धों के लिए नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, यह उत्सव प्रत्येक वर्ष पारंपरिक और धार्मिक उत्साह के साथ क्षेत्रीय लोगों द्वारा मनाया जाता हैदस दिवसीय यह उत्सव धार्मिक और आवासीय स्थानों में रोशनी के साथ शुरू होता है, इस उत्सव पर पुरानी परंपरा के अनुसार लोग अपने पूर्वज परिवार के सदस्यों की कब्र पर जाते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, उत्सव के तीसरे दिन लोग नए वर्ष के चन्द्रमा को देखने के लिए इंतजार करते हैं. भारत में लोसर देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले योल्मो, शेरपा, तमांग, गुरुंग, और भूटिया समुदायों द्वारा मनाया जाता है.

  • 3 दिनों तक चलने वाले लोसर को उत्तरकाशी के डुंडा, हर्षिल और बगोरी में रहने वाले जाड़ भेाटिया और खंपा समुदाय के लोग बडे उत्साह के साथ मनाते हैं.
  • बौद्व पंचांग के अनुसार लोसर नए साल का पहला दिन होता है. नव वर्ष की पूर्व संध्या पर अमावस की रात को भोटिया समुदाय के लोग दीपावली के रूप में मनाते हैं.
  • दीपावली में दु़ख, रोग और अशांति को नष्ट करने के प्रतीक के तौर पर मशालें जलाकर उन्हें विसर्जित किया जाता है. दूसरे दिन दशहरा मनाया जाता है और फिर अगले दिन होली.
  • इस त्योहार में होली भी रंगों की नहीं केवल आटे की और इसके बाद सुख, शांति और समृद्वि की कामना के लिए घरों पर मंत्र लिखे रंग-बिरंगे झंडे फहराए जाते हैं.
  • समापन एक दूसरे को हरियाली बांटने के साथ ही भगवान को भी चढ़ाई जाती है. इस उम्मीद के साथ कि उनका पूरा साल इसी तरह हंसते-खेलते बीते. हिंदू और बौद्व धर्म की साझी संस्कृति का प्रतीक लोसर गुरूवार को संपन्न हो गया.
  • गढ़वाल की संस्कृति में रच-बस चुके जाड, भोटिया और खांपा समुदाय के लोगों के इस त्योहार पर स्थानीय लोग भी बढ़चढ़कर भागेदारी करते हैं.
मसूरी में तिब्बती-भोटिया जनजाति का यह पर्व 16 फरवरी से शुरू होता है। जिसे लेकर समुदाय के लोगों में एक अलग ही प्रकार की ऊर्जा  दिखाई दे रही है। लोसर पर्व तिब्बत, नेपाल और भूटान का सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध पर्व है। बता दें लोसर पर्व के पहले दिन सुबह तिब्बती समुदाय के लोग दलाई हिल पहुंचे थे, जहां उन्होंने पारम्परिक झंडी बांधकर पुराने साल को विदा कर नये साल का जोरदार तरीके से स्वागत किया। इस मौके पर लोगों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर नए साल की शुभकामनायें भी दीं। तिब्बती समुदाय के लोगों ने बताया कि तिब्बती कैलेंडर के अनुसार यह वर्ष के पहले महीने का पहला दिन होता है और लोसर का अर्थ नया साल होता है। 

साथ ही उन्होंने बताया जब तिब्बत में खेत की जुताई की कला विकसित हुई थी और सिंचाई व्यवस्था और पुलों का विकास भी हुआ था। उसी के बाद लोसर पर्व को ज्योतिषीय आधार देकर  नए साल के रूप में मनाया जाने लगा।

तिब्बती लोग इस पर्व के दिन घरों की साफ-सफाई कर जौ का सत्तू, लोफूड तथा छांग जैसे व्यंजन बनाते हैं। इस दिन छोटी-मोटी दुर्घटनाओं को तिब्बती लोग शुभ मानते हैं।

कुटियट्टम लोसर महोत्सव

  • कुटियट्टम प्राचीन काल से प्रचलित रंग मंत्र कला का एक रूप है इसकी उत्पत्ति को दो हजार वर्ष पूर्व खोजा जा सकता है भारत के प्रख्यात संस्कृत नाटकों से भी इसकी उत्पत्ति को संबद्ध किया जा सकता है।
  • हाल ही में, कुटियट्टम को यूनेस्कों दव्ारा ”मानवता के मौखिक और अमूर्त विरासत की कृतियों में उत्कृष्ट” के रूप में घोषित गया है। 
  • कुटियट्टम पुरुष अभिनेताओं जिन्हें चकयार तथा महिला कलाकारों जिन्हें नागिआर कहा जाता है के एक समुदाय दव्ारा किया जाता है। इस कला में ढ़ोल बजाने वालों को नाम्बियार्स कहा जाता है, रंगशालाओं को कुट्टमपालम कहा जाता है। 
  • कुटियट्टम संस्कृत के शास्त्रीय स्वरूप और केरल की स्थानीय प्रकृति के संश्लेषण का प्रतिनिधित्व करता है। 
  • अभिनेताओं को इस कला में महारत प्राप्त करने के लिए दस से पंद्रह वर्ष के कठोर प्रशिक्षण से गुजरना होता है तभी वे अपनी श्वास पर नियंत्रण तथा चेहरे और शरीर की पेशियों में सूक्ष्म भावों की प्रस्तुति को रंग मंच के अनुसार परिवर्तित करने में समर्थ हो पाते हैं। 
  • एक अभिनेता की क्षमता किसी प्रकरण के सभी पक्षों को विस्तृत रूप में प्रदर्शित करने में मानी जाती है अत: इस कला के अंतर्गत किया जाने वाला प्रदर्शन कभी-कभी 40 दिनों तक चलता रहता है।

लोसर फेस्टिवल ऑफ़ अरुणाचल प्रदेश 

लोसर मतलब नया साल । लोसर अरुणाचल प्रदेश के तवांग डिस्ट्रिक्ट के मोनपा ( जो कि अरुणाचल प्रदेश के मुख्य tribes मे से एक है ) का सालाना उत्सव है । ये फेस्टिवल या तो फरवरी के अंत मे या मार्च के शुरू मे पड़ता है ।

मोनपा लोग लोसर की तैयारियां दिसंबर से ही शुरू कर देते है जैसे घर की साफ़ -सफाई करवाते है ,नए कपडे खरीदे जाते है,खाने पीने का सामान इकठ्ठा किया जाता है ,तरह-तरह के बिस्कुट और मीठी मठरी अलग-अलग आकार मे बनाई जाती है जो खाने मे बड़ी स्वादिष्ट होती है । ये फेस्टिवल तीन दिनों तक मनाया जाता है । पहले दिन लोग अपने घरवालों के साथ ही इसे मानते है और घर मे ही खाते पीते और विभिन्न तरह के खेल खेलते है । दूसरे दिन लोग एक -दूसरे के घर जाते है और नए साल की बधाई देते है । और तीसरे दिन prayer flags लगाए जाते है ।

monastery के बाहर भगवान् बुद्ध की प्रतिमा को एक पेड़ के नीचे स्थापित किया गया था और यहां पर सबसे पहले बुद्ध की मूर्ति की सामने दिया जलाया गया था ।क्यूंकि इस फेस्टिवल की शुरुआत सबसे पहले दिए जला कर की जाती है । और उसके बाद prayer flags को बाँधा जाता है । जिस समय इन flags को ऊपर किया जाता है उस समय flour को हाथ मे लेकर जोर जोर से बोलते है -- लहा सो लो ,की की सो सो लहा ग्यल लो ( may the gods be victorious मतलब भगवान की जीत हो )और flour को आसमान की तरफ उछालते है ।

और इस के बाद तवांग डिस्ट्रिक्ट के विभिन्न नृत्य प्रस्तुत किये गए। इनका संगीत बहुत ही मधुर होता है और डांस का स्टाइल बहुत ही smooth और soft सा होता है ।इस फोटो मे जो आदमी डांस कर रहे है उन्होंने जो cap पहनी है वो YAK के बाल से बनी है और ये मोनपा लोगों को बहुत ही traditional cap होती है । (वैसे तवांग मे स्त्री और पुरुष दोनों ही इस cap को पहनते है ।

डांस के कार्यक्रम के बीच मे ही बिस्कुट जिन्हें khapse कहते है और राईस बीयर सर्व की जाती है । और इसके बाद monastery मे ही लंच भी होता है जिसमे बिलकुल शाकाहारी भोजन सर्व किया जाता है जिसमे मटर पनीर और चावल के साथ -साथ नूडल (चाऊ मीन और फ्राइड राईस )और लोकल ब्रेड जिसे मैदे से बनाया जाता है ,मोमो ,मिक्स वेज जिसे कुछ अलग तरह के cheese से बनाया जाता है जिसकी वजहसे इसका फ्लेवर अलग ही लगता है , सर्व किया जाता है।और साथ मे fruit cream भी सर्व की जाती है ।

ल्हासा में लोसर 

तिब्बती तिब्बतियों के लिए सबसे बड़ी छुट्टी है। लॉसर (तिब्बती नया साल) हर साल मध्य जनवरी और मध्य फरवरी के बीच कुछ समय होता है। कई तिब्बती राजधानी ल्हासा के लिए एक तीर्थयात्रा बनाते हैं। उपरोक्त तस्वीर प्रसिद्ध जोखांग मंदिर की छत से ली गई है। लॉसार के दौरान, हजारों तिब्बती जोखांग के चारों ओर घूमते हैं और इसके सामने सजग हो जाते हैं। 

कई अन्य तिब्बती पवित्र झीलों और पहाड़ों के चारों ओर कोरा चलेंगे जबकि अन्य लोग जायेंगे और लामा से आशीर्वाद मांगेंगे। ल्हासा में रहने के लिए लॉसर साल का एक अच्छा समय है। तिब्बत के सभी क्षेत्रों के तीर्थयात्रियों को सड़कों पर चलना पाया जा सकता है। ज्यादातर वर्षों के लिए ल्हासा चीनी और विदेशी पर्यटकों के साथ खत्म हो गया है। लॉसर साल का एकमात्र समय है जब ल्हासा वास्तव में महसूस करता है कि यह तिब्बत में है।

  • सबसे बड़े तिब्बती बौद्ध महोत्सव लोसर का 12 दिसंबर 2015 को जम्मू एवं कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में शुभारम्भ हुआ.
  • यह त्योहार बौद्धों के लिए नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है.
  • यह उत्सव प्रत्येक वर्ष पारंपरिक और धार्मिक उत्साह के साथ क्षेत्रीय लोगों द्वारा मनाया जाता है.
  • दस दिवसीय यह उत्सव धार्मिक और आवासीय स्थानों में रोशनी के साथ शुरू होता है.
  • इस उत्सव पर पुरानी परंपरा के अनुसार लोग अपने पूर्वज परिवार के सदस्यों की कब्र पर जाते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.
  • उत्सव के तीसरे दिन लोग नए वर्ष के चन्द्रमा को देखने के लिए इंतजार करते हैं.
  • भारत में लोसर देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले योल्मो, शेरपा, तमांग, गुरुंग, और भूटिया समुदायों द्वारा मनाया जाता है.

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