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Krishna Janmastami



श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्तिहटती है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।

श्री कृष्णजन्माष्टमी

देवताओं में भगवान श्री कृष्ण विष्णु के अकेले ऐसे अवतार हैं जिनके जीवन के हर पड़ाव के अलग रंग दिखाई देते हैं। उनका बचपन लीलाओं से भरा पड़ा है। उनकी जवानी रासलीलाओं की कहानी कहती है, एक राजा और मित्र के रूप में वे भगवद् भक्त और गरीबों के दुखहर्ता बनते हैं तो युद्ध में कुशल नितिज्ञ। महाभारत में गीता के उपदेश से कर्तव्यनिष्ठा का जो पाठ भगवान श्री कृष्ण ने पढ़ाया है आज भी उसका अध्ययन करने पर हर बार नये अर्थ निकल कर सामने आते हैं। भगवान श्री कृष्ण के जन्म लेने से लेकर उनकी मृत्यु तक अनेक रोमांचक कहानियां है। इन्ही श्री कृष्ण के जन्मदिन को हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले और भगवान श्री कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस दिन भगवान श्री कृष्ण की कृपा पाने के लिये भक्तजन उपवास रखते हैं और श्री कृष्ण की पूजा अर्चना करते हैं।

श्री कृष्ण का जन्म

जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को ही कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों के मतानुसार श्री कृष्ण का जन्म का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय हुआ था। अत: भाद्रपद मास में आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यदि रोहिणी नक्षत्र का भी संयोग हो तो वह और भी भाग्यशाली माना जाता है इसे जन्माष्टमी के साथ साथ जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आज के दिन मथुरा पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जात है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।

कृष्ण जन्माष्टमी पर भक्त भव्य चांदनी चौक, दिल्ली (भारत) की खरीदारी सड़कों पर कृष्णा झुला, श्री लाडू गोपाल के लिए कपड़े और उनके प्रिय भगवान कृष्ण को खरीदते हैं। सभी मंदिरों को खूबसूरती से सजाया जाता है और भक्त आधी रात तक इंतजार करते हैं ताकि वे देख सकें कि उनके द्वारा बनाई गई खूबसूरत खरीद के साथ उनके बाल गोपाल कैसे दिखते हैं।

उपवास 

स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्य पुराण का वचन है- भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो 'जयंती' नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए।

व्रत-पूजन से जुड़ी मान्यताएं: 

  • कृष्ण जन्माष्टमी के पूरा दिन भक्त निर्जल उपवास रखते हैं. ऐसे में जरूरी है कि आप कुछ खास बातों का ध्यान रखें. अपनी सेहत के लिए जरूरी है कि एक दिन पहले खूब लि‍क्व‍िड लें और जन्माष्टमी से पिछली रात को हल्का भोजन करें.  
  • जन्माष्टमी के दिन अगर आप व्रत रखने वाले हैं या नहीं भी रखने वाले, तो सुबह जल्दी उठकर स्नान करें. मन में ईश्वर के नाम का जाप करें. 
  • व्रत रखने के बाद पूरे दिन ईश्वर का नाम लेते हुए निर्जल व्रत का पालन करें. रात के समय सूर्य, सोम, यम, काल, ब्रह्मादि को प्रणाम करते हुए पूजा को शुरू करने की मान्यता है.
  • पूजा के दौरान जल, फल और फूल वगैरह लेकर इस मंत्र का जाप शुभ माना जाता है- 
  • ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥   
  • जन्माष्टमी के दिन पूजा के लिए भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को भी स्थापित किया जाता है. इस दिन उनके बाल रूप के चित्र को स्थापित करने की मान्यता है. 
  • जन्माष्टमी के दिन बालगोपाल को झूला झुलाया जाता है. 
  • मान्यता है कि जन्माष्टमी के दिन बाल श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती देवकी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करना शुभ होता है. 
  • जन्माष्टमी के दिन सभी मंदिर रात बारह बजे तक खुले होते हैं. बारह बजे के बाद कृष्ण जन्म होता है और इसी के साथ सब भक्त चरणामृत लेकर अपना व्रत खोलते हैं.

कृष्ण जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त

वर्ष 2018 में श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2nd सितंबर 2018, रविवार को मनाई जाएगी।
  • जन्माष्टमी के दिन निशिता पूजा का समय = 23:57 से 24:43+ तक।
  • मुहूर्त की अवधि = 45 मिनट
  • जन्माष्टमी में मध्यरात्रि का क्षण = 24:20+
  • 3rd सितंबर को, पारण का समय = 20:05 के बाद
  • पारण के दिन अष्टमी तिथि के समाप्त होने का समय = 19:19
  • पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने का समय = 20:05
  • *वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी 3 सितंबर 2018 को मनाई जाएगी।
  • वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = 06:04 (सूर्योदय के बाद)
  • पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएंगे।
  • दही हाण्डी का कार्यक्रम – 3rd, सितंबर को मनाया जाएगा।
  • अष्टमी तिथि का प्रारंभ 2nd सितंबर 2018, रविवार को 20:47 बजे से होगा जिसका समापन 3rd सितंबर 2018, सोमवार को 19:19 बजे होगा।

मोहरात्रि

श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्तिहटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।
व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनिबजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।

जन्माष्टमी का उत्सव 

मथुरा और उससे सटे कई क्षेत्रों में इस पर्व को बड़े ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है। इस पर्व पर बड़े-बड़े मंदिरों में श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। उत्सव के दौरान देश विदेश से लाखों भक्तगण मंदिरों में आते है। सिर्फ मथुरा में ही नहीं अपितु देश के कई अन्य हिस्सों में भी इस पर्व को एक नन्हे बालक के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष झांकियों का आयोजन किया जाता है, भगवान कृष्ण को झुला झुलाया जाता है और बहुत से मंदिरों में रासलीला का भी आयोजन किया जाता है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर कान्हा की मनमोहक झांकियां देखने के लिए लोग देश विदेश से मथुरा आते है।

क्यों मनाया जाता है जन्माष्टमी का त्यौहार?

कंस एक बहुत ही दुराचारी और अत्याचारी राजा था जो अपनी प्रजा को बहुत पीड़ा दिया करता था। प्रजा भी उसे खास पसंद नहीं करती थी। कंस की एक बहन थी जिसका नाम देवकी था, कंस देवकी से बहुत स्नेह करता था। विवाह योग्य उम्र होने पर कंस ने देवकी का विवाह यदुवंशी राजकुमार वसुदेव से करवा दिया। विवाह के पश्चात् वे दोनों घर ही आ रहे थे की अचानक आकाशवाणी हुई, जिसमे कहा गया की देवकी की आठवीं संतान ही कंस का वध करेगी। ऐसा सुनकर कंस ने बहन को मारने के लिए तलवार निकाल ली। वसुदेव ने उसे शांत किया और वादा किया कि वे अपने सारे पुत्र उसे सौंप दिया करेंगे।

सुरक्षा के तौर पर उसने दोनों को कारागार में बंद कर दिया। और वचनानुसार जब देवकी की पहली संतान का जन्म हुआ तो उन्होंने उसे कंस को सौप दिया जिसके बाद उसने बड़ी ही क्रूरता से उसकी हत्या कर दी। कंस ने एक-एक करके देवकी के छह बेटों को जन्म लेते ही मार डाला। सातवें गर्भ में श्रीहरि के अंशरूप श्रीशेष (अनंत) ने प्रवेश किया था। कंस उसे भी मार डालेगा, ऐसा सोचकर भगवान ने योगमाया से देवकी का गर्भ ब्रजनिवासिनी वसुदेव की पत्नी रोहिणी के उदर में रखवा दिया। देवकी का गर्भपात हो गया।

जिसके बाद आठवें पुत्र के रूप में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया तथा योगमाया को यशोदा के गर्भ से जन्म लेने का आदेश दिया। श्रीकृष्ण जन्म लेकर, देवकी तथा वसुदेव को अपने विराट रूप के दर्शन देकर, पुन: एक साधारण बालक बन गये। यह अवतार उन्होंने भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात में लिया था। तभी से इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा।

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