Ganesh Chaturthi

पुराणों के अनुसार इसी दिन गणेश का जन्म हुआ था। बुद्धि, समृद्धि और ज्ञान के देवता गणपति महाराज को प्रसन्न करने का ये सबसे बड़ा दिन है। सही समय और मुहूर्त पर की गई पूजा हर इच्छा को पूरा करती है।

गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र में बडी़ धूमधाम से मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार इसी दिन गणेश का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर हिन्दू भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस प्रतिमा का 9 दिन तक पूजन किया जाता है। बड़ी संख्या में आस पास के लोग दर्शन करने पहुँचते है। 9 दिन बाद गाजे बाजे से श्री गणेश प्रतिमा को किसी तालाब इत्यादि जल में विसर्जित किया जाता है।

गणेश चतुर्थी का उत्सव

भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है। गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, १० दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणपति पूजा मुहूर्त

चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = १२/सितम्बर/२०१८ को १६:०७ बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त = १३/सितम्बर/२०१८ को १४:५१ बजे
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है।

गणपति स्थापना 

बुद्धि और ज्ञान के देवता गणपति महाराज को प्रसन्न करने का ये सबसे बड़ा दिन है। सही समय और मुहूर्त पर की गई पूजा हर इच्छा को पूरा करती है। मान्यता है की गणपति जी का जन्म मध्यकाल में हुआ था इसलिए इनका पूजन भी इस दौरान करना चाहिए। इस दिन व्रत रख कर और खास पूजन व उपायों से बप्पा को प्रसन्न किया जा सकता है। 

  • सुख की कामना है तो 'इदं अक्षतम् ऊं गं गणपतये नमः' मंत्र बोलते हुए बप्पा को सूखे चावल चढ़ाएं।
  • गणेश जी को सिंदूर बहुत भाता है, ये मंत्र बोलते हुए उनके मस्तक पर सिंदूर लगाएं  'सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्। शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥ ओम गं गणपतये नमः' उसके बाद वही सिंदूर अपने माथे पर लगा लें।
  • पैसे की दिक्कत दूर करने के लिए शमी के कुछ पत्ते हर रोज गणेश जी को चढ़ाने चाहिए।
  • श्री गणाधिपतयै नमः मंत्र का जाप करने से प्रमोशन के योग बनते हैं।
  • गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ हर समस्या का अंत करता है। इस पाठ में बताया गया है, जो व्यक्ति बप्पा को मोदक का भोग लगाता है, उसका कभी अमंगल नहीं हो सकता।
  • श्रीगणेश का जल से अभिषेक करें।
  • आर्थिक समस्या को दूर करने के लिए बप्पा को दूर्वा (उनके मस्तक पर रखें, चरणों में नहीं), तिल के लड्डू, गाय के शुद्ध घी और गुड़ का भोग लगाएं। 
  • हाथी को हरा चारा खिलाएं।
  • गणेश मंदिर में शुद्ध देसी घी का दीपक लगाएं।

श्रीगणेश कथा

शिवपुराणके अन्तर्गत रुद्रसंहिताके चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपालबना दिया। शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिवगणोंने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णुजीउत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुखबालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर!तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अ‌र्घ्यदेकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्षपर्यन्तश्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।